Bharat ki sabhyata
सिंधु सरस्वती सभ्यता –
भारत विश्व के सबसे प्राचीन देशों में से एक हैं इसका इतिहास इसकी सभ्यता तथा इसकी संस्कृति बहुत प्राचीन है पुरातात्विक आधारों पर पुरातत्वविद ने पता लगा लिया है कि आज से लगभग 5 से 7000 वर्ष पहले भारत की प्रमुख नदियां जैसे सरस्वती सिंधु है उसकी सहायक नदियों के किनारों पर विचरण करने वाले मानव समूह ने अपनी स्थाई बस्तियां बसा कर रहना आरंभ कर दिया था और इन बस्तियों में रहते हुए उन्होंने उन्नत सभ्यता व संस्कृति का विकास कर लिया था
सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत के कैलाश मानसरोवर के उत्तर में स्थित सेनगेखब सिहमुख व हिमनद से माना जाता है
सरस्वती नदी का उद्गम शिवालिक की पहाड़ियों से माना जाता है
यहां से यह आदि बद्री के पास मैदान में प्रवेश करती हैं यह दक्षिणी पश्चिमी दिशा में बहती हुई कुरुक्षेत्र घग्घर हाकड़ा होती हुए हरियाणा के सिरसा स्थान से राजस्थान के नोहर में प्रवेश करती थी यहां से बीकानेर व जैसलमेर होती हुई गुजरात के कच्छ के रण में प्रवेश कर प्रभास पतन के पास समुद्र में गिरती थी वर्तमान में सरस्वती नदी भौतिक रूप से अस्तित्व में नहीं है
भू–सरचना में परिवर्तन के कारण यह विलुप्त हो गई
वैदिक साहित्य रामायण में महाभारत में सरस्वती नदी के अस्तित्व के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध होते हैं
महाभारत युद्ध के समय श्री कृष्ण के भाई बलराम ने सरस्वती नदी पर स्थित तीर्थों की यात्रा की थी
राजस्थान के मरूप्रदेश मे भी सरस्वती नदी के किनारे बसे कई नगरों के पुरातात्विक अवशेष आज भी विद्यमान हैं कालीबंगा उनमें से एक हैं
सिंधु व सरस्वती नदी तथा उनकी सहायक नदियों के विस्तृत भू-भाग में विकसित मानव सभ्यता को सिंधु सरस्वती सभ्यता के नाम से जाना जाता है
सिंधु सरस्वती सभ्यता का जन्म काफी पहले हुआ था और 3250 ईशा पूर्व तक यह पूर्ण रूप से विकसित हो गई थी इसके बाद यह 3250 से 2750 ईसा पूर्व तक चरम विकास पर पहुंच गई थी फिर 2750 ईसा पूर्व के बाद इस सभ्यता का अवसान प्रारंभ हुआ और 1500 ईसा पूर्व तक आते-आते यह विलुप्त हो गई
सिंधु– सरस्वती सभ्यता का उत्खनन
1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के मंतगोमरी जिले में हड़प्पा नामक कस्बे के पास बहने वाली रावी नदी के बाएं किनारे पर बने हुए एक पुरातत्व टीले की खोज की रायबहादुर दयाराम साहनी की तरह ही भारत के एक दूसरे पुरातत्व के राखलदास बनर्जी ने सन 1922 में अविभाजित भारत के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में बहने वाली सिंधु नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित मोहनजोदड़ो नामक किले की खोज की
मोहनजोदड़ो का अर्थ होता है मुर्दों का टीला इस टीले की खुदाई से 9 बार बसन और 9 बार उजड़ने वाले एक व्यवस्थित नगर के अवशेष बाहर निकल आए
सन 1947 में भारत के विभाजन के बाद सिंधु सरस्वती सभ्यता के कुछ पुरातात्विक बड़े स्थल हड़प्पा मोहनजोदड़ो गैन्वेरीवाला आदि पाकिस्तान के हिस्से में चले गए
कालीबंगा राखीगढ़ी धोलावीरा लोथल रंगपुर आदि बड़े पुरातत्विक स्थल भारत में हैं
सिंधु सरस्वती सभ्यता की विशेषताएं
(अ) नगर नियोजन–सिंधु सरस्वती सभ्यता के विकसित और उन्नत स्तर को प्रकट करने वाले अवशेषों में सबसे महत्वपूर्ण अवशेष इस सभ्यता से संबंधित नगरों के हैं ऐसे नगरवशेषो मे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो दोनों अब पाकिस्तान में है कालीबंगा राजस्थान राखीगढ़ी हरियाणा तथा धोलावीरा लोथल गुजरात के अवशेष अत्यधिक महत्वपूर्ण है
आवास योजना का दृश्य
नगर की आवास योजना–सिंधु सरस्वती सभ्यता के नगरों की सुव्यवस्थित सड़क प्रणाली के परिणाम स्वरुप समेत नगरों की आवास योजना में एक व्यवस्था उत्पन्न हो गई थी और नगर के खंडों और महल में विभक्त होकर सुनियोजित स्वरूप में उभर गए थे समानता प्रत्येक मकान में बीच में खुला आंगन रखा जाता था और आंगन के चारों तरफ कमरे बनाए जाते थे लगभग सभी मकानों में पानी रखने के फिरोने या सरेंड शौचालय व स्नानघर अलग से निर्मित होते थे
सड़क व्यवस्था–सिंधु सरस्वती सभ्यता से संबंध में ग्रुप की सड़क के पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की तरफ सीधी समांतर निर्मित की गई थी एक दूसरे को समकोण पर काटती थी जहां चौराहे बने हुए थे नगरों की मुख्य और बड़ी सड़के सामान्यता 10 मीटर छोटी सड़के 5 मीटर तथा गलियों 1 से 2 मीटर तथा थोड़ी होती थी सड़कों के किनारों पर स्थान पर कूड़ा कचरा डालने के लिए कूड़ा दान रखे रहते थे
नगर की सफाई जल निकास प्रणाली और स्वच्छता का प्रबंध–
सिंधु सरस्वती सभ्यता से संबंधित नगरों और नगरों के मकानों में स्वच्छता और सफाई की समुचित व्यवस्था देखने को मिलती हैं नगरों की गलियों सड़कों और मुख्य सड़कों पर बनी छोटी बड़ी नालियों और गटेरो से सेज में ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मकानों मोहल्लों और पूरे नगर से गंदा पानी बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था थी
विशेष निर्मितिया – सिंधु सरस्वती सभ्यता के काल के विभिन्न नगरों की पुरातात्विक खुदाई में कुछ विशेष प्रकार की निर्मित या भवन और इमारतों के अनावश्यक निकले हैं इसमें नगर की घड़ी वाले भाग में रक्षा प्राचीन धातु पिंगला ने कई स्थान भर्तियों यज्ञ वैदियों विशाल स्नानागार तथा विशाल अन्नागार आदि प्रमुख हैं
परिवार व्यवस्था–सिंधु सरस्वती सभ्यता काल के भवनों में मकानों की व्यवस्था के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि उनके समाज की प्रमुख इकाई परिवार था बहुत अधिक संख्या में नारियों की मूर्तियां मिलने से यह माना जाता है कि सिंधु सरस्वती सभ्यता के काल के समाज और परिवार में नारी को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था पर्दा प्रथा प्रचलित नहीं थी इस तरह चांदी व तांबे के आभूषण पहनती थी यह लोग सूती वस्त्र पहनते थे
इन्हें अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान भी था मनोरंजन के साधनों में संगीत नृत्य व शिकार प्रमुख थे सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग गेहूं जो चावल दूध तथा मांसाहार का भोजन में उपयोग करते थे
आर्थिक जीवन–
कृषि व पशुपालन–कालीबंगा में जूते हुए खेत के अवशेष मिलते हैं इससे पता लगता है कि सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग खेती करते थे वस्त्रों पर बने चित्रों के आधार पर पता चलता है कि सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग गेहूं जो चावल तिल आदि की खेती करते थे फल भी उगाते थे काशी के साथ पशुपालन सिंधु सरस्वती सभ्यता से संबंधित लोगों का मुख्य व्यवसाय था पालतू पशुओं में गोवंश का महत्व अधिक था
व्यापार वह वाणिज्य–
यहां के निवासी तांबे वे कांसे के बर्तन में औजार बनाने के साथ मिट्टी के बर्तन में मटके बनाने की कला में निपुण थे चंद्र दलों तथा कालीबंगा की खुदाई में तोल के अनेक भाग निकले हैं
मोहनजोदड़ो में सीप की एक टूटी पटरी मिली है यह अवशेष उन्नत और विकसित व्यापारी एवं गणित संबंधी ज्ञान के परिचायक हैं गुजरात में लोथल नामक स्थान पर खुदाई में निकली एक गोदी बंदरगाह के अवशेष उसे पता चलता है कि यह समुद्री यातायात का प्रमुख केंद्र था मिश्र सुमेर सीरिया आदि दूर देशों से इनके घनिष्ठ व्यापारिक संबंध है भारत में मेसोपोटामिया की खुदाही से प्राप्त वस्तुओं में समानता का मिलना इस बात का प्रमाण है कि उनमें आपस में वस्तुओं का क्रय विक्रय होता था व्यापार की उन्नत व्यवस्था के कारण ही सिंधु सरस्वती सभ्यता को विकास प्रधान सभीयता कहा जाता है
धार्मिक जीवन–
सिंधु सरस्वती सभ्यता काल के लोग प्रमुख रूप से प्राकृतिक शक्तियों के उपासक थे तथा पृथ्वी पीपल में जल सूर्य अग्नि आदि में देवी शक्ति मानकर उनकी उपासना करते थे मूर्तियों और मुद्रा व तथा ताबीजों के विश्लेषण के आधार पर यह स्पष्ट होता है बलि प्रथा तथा जादू टोना आदि अंधविश्वास भी प्रचलित है लोथल बनावली एवं राखीगढ़ी से प्राप्त अग्नि वेदीकाओ से लगता है कि वहां यज्ञों में अग्नि पूजा का प्रचलन रहा होगा मूर्तियों की उपासना के लिए धूप जलाई जाती थी मात्र देवी व शिव की उपासना भी की जाती थी मृतक संस्कार शव को गाड़ कर या दहा कर्म करके किया जाता था
वैदिक साहित्य–
आर्य विधान ने जिस साहित्य की रचना कि वह वैदिक साहित्य के नाम से विख्यात हैं भारत में विकसित होने वाली वैदिक सभ्यता की जानकारी कराने वाले स्रोतों में प्रमुख स्थान वैदिक साहित्य का है वेद ब्राह्मण उपनिषद आरण्यक ष्ट वेदांग आदि वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रंथ हैं वेद चार हैं ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद अर्थववेद इस साहित्य के माध्यम से तत्कालीन वैदिक सभ्यता की विशेषताओं को इस स्वरूप में देखा जा सकता है
सामाजिक जीवन–
वर्ण व्यवस्था–वैदिक काल में समाज में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी वर्ण चार माने गए हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र यह वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित ने होकर क्रम आधारित थी जिसमें व्यक्ति की योग्यता व कार्यों से उसका वर्णन निर्धारित होता था इस तरह वर्ण व्यवस्था का प्रारंभिक स्वरूप बहुत अच्छा था व क्रम और शर्म के सिद्धांत पर आधारित था
परिवार– समाज की मूल इकाई परिवार थी इस काल में संयुक्त परिवार की प्रधानता थी परिवार में सबसे बड़ा पुरुष मुख्य होता था उसे ग्रह पति कहा जाता था वैदिक समाज में स्त्री का बहुत सम्मान था पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था युवा एक अनुबंध ने होकर धार्मिक संस्कार था
आश्रम में संस्कार व्यवस्था– वैदिक काल में सामाजिक संचालन के लिए आश्रम व्यवस्था प्रचलित थी मनुष्य की आदर्श आयु 100 वर्ष की मानकर जीवन को चार कालो ब्रह्मचर्य आश्रम ग्रस्त आश्रम वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम में विभाजित किया गया था यह आश्रम व्यवस्था विश्व में जीवन प्रबंध का अनुपम उदाहरण है
भोजन वेशभूषा में मनोरंजन– वैदिक काल के लोग भोजन में जो गांव चावल उड़द दूध दही का विशेष प्रयोग करते थे जहां तक वेशभूषा का सवाल है सूती उन्नी और रेशमी तीनों तरह के वस्तुओं का उपयोग किया जाता था स्त्री व पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे आभूषणों में कर्ण फूल कंठहार कंगन आदि पहने जाते थे
रथ दौड़ घुड़दौड़ शिकार वे मल्लयुद्ध मनोरंजन के प्रमुख साधन थे संगीत व नृत्य लोकप्रिय थे तथा प्रमुख वाद्य यंत्रों में वीणा बांसुरी शंख झांज व मृदंग आदि प्रचलित थे



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें